नारी: गुणों की खान या उपेक्षाओं का पुतला? International Women's Day Special Report | Khabarforyou.com
- DIVYA MOHAN MEHRA
- 08 Mar, 2026
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आज जब दुनिया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है, तब ब्रांड्स के "स्पेशल डिस्काउंट" और राजनेताओं के "नारी शक्ति को नमन" वाले संदेश अपने चरम पर हैं। दिल्ली के न्यूज़रुम से लेकर ग्रामीण भारत की चौपालों तक, विमर्श आज भी वहीं टिका है: त्याग, ममता और सहनशीलता के चश्मे से स्त्री का महिमामंडन।
लेकिन यदि हम आज के भारतीय सामाजिक ताने-बाने की गहराई से पड़ताल करें, तो एक अधिक जटिल और परेशान करने वाली सच्चाई सामने आती है। "त्याग की प्रतिमूर्ति" और "शक्ति का आधार" जैसे काव्यात्मक विशेषणों के पीछे एक ऐसा 'पवित्र जाल' छिपा है, जो स्त्री को एक साधारण, स्वतंत्र और अपनी इच्छाओं वाले इंसान के रूप में पहचान बनाने से रोकता है।
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गुणों का बोझ: एक सामाजिक थोपी गई पहचान?
पारंपरिक भारतीय दृष्टिकोण, जो अक्सर मुख्यधारा के मीडिया और सांस्कृतिक विमर्श में झलकता है, स्त्री को गुणों की एक सूची के माध्यम से वर्गीकृत करता है: प्रेम, करुणा, वात्सल्य और क्षमा। समाजशास्त्रियों का तर्क है कि हालांकि ये गुण महान हैं, लेकिन इनका उपयोग "आदर्श नारी" का एक कठोर खाका तैयार करने के लिए किया गया है।
जेंडर स्टडीज के विशेषज्ञों का मानना है कि हमने सदियों से लड़कियों को यह विश्वास दिलाने में बिता दी हैं कि उनका मूल्य उनकी सहन करने की क्षमता पर निर्भर है। जब हम किसी महिला को ‘गुणों की खान’ कहते हैं, तो हम केवल उसकी प्रशंसा नहीं कर रहे होते, बल्कि उसके चारों ओर एक लक्ष्मण-रेखा भी खींच रहे होते हैं। यदि वह उस रेखा से बाहर कदम रखती है यदि वह क्रोध करती है, महत्वाकांक्षी होती है, या परिवार की सेवा के ऊपर अपने विश्राम को चुनती है - तो समाज उसे तुरंत 'विद्रोही' या 'असफल' की श्रेणी में डाल देता है।
यहाँ मुख्य प्रश्न यह है: क्या ये गुण जन्मजात हैं, या समाज ने इन्हें स्त्री के व्यक्तित्व पर केवल इसलिए आरोपित कर दिया है ताकि व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे? स्त्री को 'स्वभाव से' दयालु बताकर, समाज भावनात्मक जिम्मेदारी का सारा बोझ उसके कंधों पर डाल देता है और पुरुषों को इन नैतिक अपेक्षाओं से मुक्त कर देता है।
रिश्तों के परे: बेटी, बहन, पत्नी और माँ
महिला दिवस पर उठने वाली सबसे गहरी आलोचनाओं में से एक 'व्यक्तिगत पहचान का मिटना' है। भारतीय भाषणों और विज्ञापनों में स्त्री को शायद ही कभी एक स्वतंत्र इकाई के रूप में पेश किया जाता है; वह लगभग हमेशा किसी पुरुष के साथ उसके रिश्ते से परिभाषित होती है।
किसी की बेटी, पत्नी या माँ होने के नाते ही उसे सम्मान का पात्र माना जाता है। यदि समाज केवल इसलिए स्त्री का सम्मान करता है क्योंकि वह उसे अपनी माँ की याद दिलाती है, तो यह सम्मान उसकी मानवता का नहीं, बल्कि उसके द्वारा दी जाने वाली 'सेवा' का है।
जांच के दौरान यह पाया गया कि शहरी क्षेत्रों में भी, जो महिलाएं अपने सपनों या 'सेल्फ-केयर' को पारिवारिक दायित्वों से ऊपर रखती हैं, उन्हें आज भी सूक्ष्म सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। उनके व्यक्तित्व को समझने के बजाय, उन्हें उनके गुणों के तराजू पर तौला जाता है।
‘मूर्तिकरण’ का संकट
‘सहनशीलता की मूर्ति’ यह मुहावरा शायद भारतीय महिलाओं को दिया गया सबसे हानिकारक सम्मान है। किसी इंसान को 'मूर्ति' बना देने का अर्थ है कि आपने उससे दर्द महसूस करने, शिकायत करने या असफल होने का अधिकार छीन लिया है।
एक मूर्ति को उड़ने के लिए आकाश की आवश्यकता नहीं होती, उसे बस एक स्थिर आधार पर टिके रहना होता है। समाज जितना अधिक महिला के संघर्ष को 'महान' बताकर उसका महिमामंडन करता है, उतना ही वह उस व्यवस्था को सुधारने की जिम्मेदारी से बचता है जो उस संघर्ष का कारण है।
नीतिगत कमियाँ: मातृत्व अवकाश में सुधार तो हुआ है, लेकिन पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) की कमी आज भी 'पालन-पोषण' की पूरी जिम्मेदारी महिला पर ही डालती है।
सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता: अक्सर 'सुरक्षा' के नाम पर महिला की आवाजाही को सीमित कर दिया जाता है, बजाय इसके कि सार्वजनिक स्थानों को उसकी स्वायत्तता के लिए सुरक्षित बनाया जाए।
निष्कर्ष: वास्तविक स्वतंत्रता की ओर
जैसे-जैसे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का सूरज ढल रहा है, धरातल से उठने वाली मांग स्पष्ट है: महिलाएं न तो देवी बनना चाहती हैं और न ही शहीद। वे केवल इंसान बनना चाहती हैं।
इस दिन को सही मायने में सार्थक बनाने के लिए, हमें 'गुणवती नारी' के उत्सव से आगे बढ़कर 'स्वतंत्र व्यक्ति' के सम्मान तक पहुँचना होगा। समाज वास्तव में तब आगे बढ़ेगा जब वह स्त्री को केवल त्याग की मूर्ति नहीं, बल्कि एक चेतना संपन्न मनुष्य मानेगा। उसे अपेक्षाओं की सीमाओं में बाँधने के बजाय, उसे वह खुला आकाश देना होगा जहाँ वह अपनी गलतियों, अपनी इच्छाओं और अपने अस्तित्व के साथ जी सके।
सच्चा सशक्तिकरण केवल उसे अधिकार देना नहीं है, बल्कि उसे यह अधिकार देना भी है कि वह दूसरों के लिए जीने से पहले स्वयं के लिए जीना शुरू करे, बिना किसी अपराधबोध के।
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